यौगिक-षट्कर्म

शरीर को कायाकल्प करते हैं यौगिक षट्कर्म

षट्कर्म दो मुख्य प्राण प्रवाहों इड़ा और पिंगला के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हैं ,जिससे शारीरिक और मानसिक शुद्धि एवं संतुलित की प्राप्ति होती है ये शरीर में उत्पन्न त्रिदोषों वात,पित्त और कफ़ को भी संतुलित करते हैं
आयुर्वेद एवं हठयोग दोनों के अनुसार , इन त्रिदोषों में असंतुलन ही रोग का कारण बनता है इन षट्कर्मो का उपयोग प्राणायाम तथा योग के अन्य उच्च अभ्यासों के पूर्व भी किया जाता है, ताकि शरीर विकार रहित हो जाए आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर होने में बाधा उत्पन्न न करे
धौति, वस्ति तथा नेति नौली कपालभाति ये षट्कर्म कहे गए है
अस्वस्थता ही सबसे बड़ी बीमारी है और अस्वस्थता का मूल कारण है शरीर में विकारों का उत्पन्न होना अशरीर का अशुद्ध होना द्य इनके कारण ही समस्त रोगों का जन्म होता है ये षट्कर्म की क्रियाएं शरीर को शुद्द करती हैं करके कायाकल्प करती हैं इन सभी क्रियाओं के द्वारा के विभिन्न अंगो की सफाई होती है, जिससे उनकी क्रियाशीलता बढती है और वे अपनी उपयुक्त क्षमता के अनुसार कार्य करते हैं अंगो की क्रियाशीलता से शरीर निरोग , बल व बुद्धि युक्त कान्तिवान बनता है द्य इन सभी लाभों के कारण ही यौगिक षट्कर्मो का महत्व वर्तमान समय में अधिक बढ़ गया है

 धौति क्रिया यह पहली क्रिया है धौति में आमाशय और अन्न नलिका की सफाई होती है यह सफाई पानी से भी कर सकते हैं और कपड़े से भी कर सकते हैं तथा वायु से भी कर सकते हैं द्य इसकी तीन विधियाँ इस अभ्यास से आमाशय के दोष दूर होते हैं अपच, तथा पेट सम्बन्धी बीमारियाँ दूर होती हैं
 वस्ति क्रिया- – यह एक योगिक एनिमा है द्य गुदा के द्वार से जल खींचना , कुछ समय तक उसे अपने शरीर के भीतर ,अर्थात बड़ी आंत में रखन उसके बाद उस जल को बाहर निकाल दिया जाता है द्यइससे कब्ज जैसे रोगों कभी नही होते हैं व आंते निर्मल बनती है

 नेति क्रिया नेति क्रिया म्ण्छण्ज् कवबजवत की तरह कार्य करती है यह नाक,कान एवं गले की सफाई करती है द्य यह एक बहुत ही सरल क्रिया है द्यएक नासिकारन्ध्र से पानी डालना और दूसरी से निकालना देना यह नासिका के अंदर सायनस को साफ़ कर देती है जिन लोगों साइनोसाईटिस , माइग्रेन , आँखों के रोग व कान से सम्बन्धित रोगों में बहुत लाभ होता है

 नौली क्रिया यह चैथा अभ्यास है नौलि जिसे लौलिकी भी कहते हैं यह पेट के अन्दर के अंगो की मालिश कर उन्हें बल प्रदान करने वाली शक्तिशाली विधि है इसके अभ्यास से अपचन, भूख की कमी व पेट सम्बन्धी समस्याओं में लाभ होता है
 त्राटक आँखों व तंत्रिका तंत्र के विकारों को दूर करने के लिए यह अभ्यास बहुत उपयोगी है त्राटक का अर्थ होता है एक टक किसी बिंदु या ज्योति की तरफ देखना त्राटक के अभ्यास से आँखों के निकट दृष्टि व दूर दृष्टि के रोग ठीक होते हैं
यह भी अक्सर देखा गया है कि केवल त्राटक के अभ्यास से ही कई लोगों का चश्मा उतर जाता है

 कपालभाति यह फेफड़ों का अभ्यास है इससे फेफड़ो से सम्बन्धित दोष दूर होते हैं वायु नली विकार रहित बनती है तथा रक्त भी शुद्ध होता है , क्योंकि हम अधिक मात्रा में आक्सीजन भीतर ले जाते हैं मस्तिष्क रोग में भी कपालभाति लाभदायक है जिन लोगों की याददाश्त कम हो जाती है उनके लिए यह बहुत उपयोगी है

योगाचार्य तरुण ; एम ए योग विज्ञान
मुख्य योग शिक्षक पतंजलि योगपीठ हरिद्वार

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